गुनाहों का देवता — धर्मवीर भारती।

कुछ किताबें शोर करती हैं।

यह चुपचाप आती है — और चुप्पी ज़्यादा देर तक रहती है।
धर्मवीर भारती का यह उपन्यास पढ़ते हुए एक अजीब बेचैनी होती है। न कोई नाटकीय मोड़, न कोई बड़ा तूफ़ान — बस एक धीमी, भीतरी जलन जो पन्ने-दर-पन्ने बढ़ती रहती है। जब तक आप समझ पाते हैं कि यह किताब आपके साथ क्या कर रही है, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।
कहानी ऊपर से सरल है। चंदर सुधा से प्यार करता है। सुधा चंदर से। लेकिन वे साथ नहीं हो सकते — किसी बड़े बाहरी कारण से नहीं, बल्कि कुछ और शांत और ज़्यादा विनाशकारी चीज़ की वजह से: दमन, बलिदान, और वह धीमी हिंसा जो तब होती है जब हम वही करते रहते हैं जो दूसरे चाहते हैं।

वह आदमी जिसने खुद को तोड़ा
जो बात सबसे ज़्यादा मन में रही, वह प्रेम कहानी नहीं थी — वह था चंदर का बाद का सफ़र। सुधा के बाद वह पम्मी की तरफ़ मुड़ता है, फिर बिनती की तरफ़ — ऐसे रिश्तों में जो प्यार कम, आत्म-दंड ज़्यादा लगते हैं।
यह कहना आसान होता कि समाज ने उसे तोड़ा — मर्यादाओं का बोझ, कर्तव्य का दबाव, एक ऐसी दुनिया जिसके पास उसकी भावनाओं के लिए कोई भाषा नहीं थी। लेकिन मुझे लगता है सच यह है कि चंदर ने खुद को तोड़ा। समाज ने हथियार दिए, हाँ — लेकिन इस्तेमाल उसने खुद किया।
एक खास किस्म की आत्म-विनाश होती है जो बलिदान के वेश में आती है, जो यह कहती है कि मैं यह सब दूसरों के लिए कर रहा हूँ। चंदर उसका उस्ताद है। और भारती उसे कभी जज नहीं करते — यही बात सबसे ज़्यादा तकलीफ़ देती है।

जितना सोचा था, उससे कहीं ज़्यादा शांत
रागदरबारी के ठीक बाद यह उपन्यास पढ़ा — और फ़र्क़ उतना ही गहरा था जितना हो सकता है। जहाँ शुक्लजी की भाषा व्यंग्य का हथियार है, बाहर की तरफ़ ताकती है — भारती की भाषा भीतर की तरफ़ मुड़ती है। यहाँ कोई तंज़ नहीं, कोई कटाक्ष नहीं। बस एक धीमी, दर्दनाक पड़ताल कि अच्छा इंसान बने रहने की क़ीमत क्या होती है — और क्या वह क़ीमत चुकाने लायक है।
भारती की भाषा में एक काव्यात्मक संयम है। सुंदर है, पर दिखावटी नहीं। भावनात्मक है, पर भावुक नहीं। वे जानते हैं कि पाठक को कितने क़रीब लाना है — और ठीक उस पल वापस खींच लेते हैं। यही दूरी, यही नियंत्रण, टूटने के पलों को इतना असहनीय बनाता है।

अंत
किताब ख़त्म हुई तो मन शांत था। न टूटा हुआ, न बेचैन — बस सोचता हुआ। ऐसा अंत जो सुलझाता नहीं, बस छोड़ देता है। हाथ में कुछ रह जाता है जिसका नाम नहीं पता — बलिदान के बारे में एक सवाल, प्यार के बारे में, इस बारे में कि हम जो सबसे दर्दनाक फ़ैसले करते हैं, क्या वे सच में दूसरों के लिए होते हैं — या आख़िरकार, हमेशा, अपने लिए?
जवाब अभी तक नहीं मिला। शायद भारती यही चाहते थे।

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Comments

2 responses to “गुनाहों का देवता — धर्मवीर भारती।”

  1. gaurav tripathi Avatar
    gaurav tripathi

    काफ़ी संक्षिप्त और काफ़ी बेहतरीन तरीके से आपने रोहित बयान किया है किताब को। मैं भी सहमत हूं इस बात से कि किताब आपको यह सोचने के लिए मजबूर करती है कि जो भी इंसान कर रहा है वह स्वयं के लिए कर रहा है या दूसरों के लिए और अगर दूसरों के लिए कर रहा है तो यह हक किसने दिया उसको और अगर स्वयं से किया है तो यह द्वेष कैसा ।। मेरे हिसाब से चंदर प्रोफ़ेसर साहब के द्वारा की गई मदद से (जो वह उसे उपकार समझता है) खुद को उनके प्रति कर्तव्यहीन बताने लगता है और सुधा को प्रेम से ज्यादा एक कर्तव्य की तरह देखता है जबकि सुधा उसे एक मदद से ज्यादा प्रेम की तरह देखती है और मेरे ख्याल से यही इस कहानी का पेच है ।। एक नज़रिया यह भी हो सकता है कि सुधा की शादी जिस इंसान से तय होती है वह भी अच्छा मनुष्य सक्षम पुरुष था और चंदर अपने आप को उतना सक्षम नहीं समझता सो वह भी सहमत कर लेता है खुद को कि सुधा के लिए वह ठीक नहीं अत: उसका कर्तव्य फिर उसके सामने आ जाता है।।

    जो मुझे एक चीज़ और अच्छी लगती है इस किताब की यह आपको सिर्फ प्यार और कर्तव्य तक सीमित नहीं रखता है। पम्मी का आना, जिसके लिए प्रेम की अपनी परिभाषा है, बिनती का होना जो सिर्फ इसलिए चंदर से प्रेम करती है क्योंकि उसने चंदर को सुधा की नज़र से देखा है।। धर्मवीर भारती यह अलग अलग प्रेम को भी उतनी ही नज़ाकत से बयान किए है।।

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    1. R!P Avatar

      बिल्कुल सही— और यह नज़रिया मेरे पढ़ने से गहरा है।
      उपकार बनाम प्रेम का यह फ़र्क़ — चंदर के लिए प्रोफ़ेसर साहब की मदद एक बोझ बन जाती है, और सुधा उस बोझ का हिस्सा। जबकि सुधा के लिए वही रिश्ता बिल्कुल उलटा है — वह उपकार नहीं देखती, सिर्फ़ चंदर को देखती है।

      यही शायद पूरी त्रासदी की जड़ है।
      और पम्मी व बिनती वाली बात — एकदम सटीक। भारती यहाँ यह नहीं कह रहे कि एक प्रेम सही है और बाकी गलत। वे दिखा रहे हैं कि प्रेम हर बार अलग भाषा में आता है — पम्मी की अपनी परिभाषा है, बिनती का प्रेम तो और भी दिलचस्प है — वह चंदर को सुधा की आँखों से देखकर प्यार करती है। यानी एक प्रेम दूसरे प्रेम की छाया में पला।
      शुक्रिया — इस comment ने किताब को एक बार और खोल दिया। 🙏

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