दीवार में एक खिड़की रहती थी — एक पाठक की नज़र से

कुछ किताबें होती हैं जो पढ़ते वक्त लगती हैं कि सब कुछ जाना-पहचाना है — और फिर अचानक कोई एक वाक्य आता है जो आपको रोक देता है। आप सोचते हैं: यह दुनिया असली है या नहीं? विनोद कुमार शुक्ल की यह उपन्यास ऐसी ही है।

रघुवर प्रसाद का जीवन बिल्कुल साधारण है — एक छोटा सा घर, एक नौकरी, एक दिनचर्या। लेकिन उनके घर की दीवार में एक खिड़की है जो किसी और दुनिया में खुलती है। यह खिड़की सिर्फ एक वास्तुशिल्पीय तथ्य नहीं है — यह एक साझा स्वप्न है, एक बेहतर भविष्य की झलक। और यह झलक रघुवर प्रसाद को विवाह से पहले अकेले दिखती है, लेकिन जब वे और सोनसी साथ उसमें कदम रखते हैं, तो वह पूरी तरह खुलती है। प्रेम ही वह कुंजी है जो इस खिड़की को पूरा करती है।

उपन्यास में हाथी, साधु और साइकिल — ये सब उस खिड़की की दुनिया के असली-जगत में प्रतिबिंब हैं। वे अजीब हैं, पर डराते नहीं। वे रोज़मर्रा की ज़िंदगी में इस तरह घुले-मिले हैं जैसे जादू और सच्चाई में कोई फ़र्क ही न हो। शुक्ल जी की यही खूबी है — वे असाधारण को इतनी सहजता से लिखते हैं कि पाठक भी उसे स्वाभाविक मान लेता है।

एक दृश्य जो मन में रह गया — वह लड़का जो पेड़ पर चढ़कर अपने पिता की दुनिया से भागना चाहता है और अपनी अलग दुनिया बनाना चाहता है। लेकिन धीरे-धीरे उसे समझ आता है कि दोनों दुनियाओं को एक होना होगा। यह दृश्य रघुवर प्रसाद की अपनी यात्रा का दर्पण है — बाहरी और भीतरी दुनिया का विलय।

भाषा की बात करें तो शुक्ल जी की हिंदी बेहद सादा है — लगभग बच्चों जैसी सरल — लेकिन उसमें एक गहराई है जो पहली नज़र में नहीं दिखती। हर वाक्य एक चित्र है। पढ़ते-पढ़ते लगता है जैसे हम किसी स्वप्न में चल रहे हैं जो हमारा अपना भी है।

मुराकामी के पाठकों के लिए यह उपन्यास एक विशेष अनुभव होगा। वही एकांत, वही धुंधली वास्तविकता, वही अनुत्तरित रूपक — बस यहाँ सब कुछ छत्तीसगढ़ की मिट्टी में जड़ा हुआ है, जापान की बजाय।

अगर आप ऐसी किताब ढूंढ रहे हैं जो आपको दुनिया से थोड़ा बाहर ले जाए — लेकिन पूरी तरह नहीं — तो दीवार में एक खिड़की रहती थी आपके लिए है।

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Comments

2 responses to “दीवार में एक खिड़की रहती थी — एक पाठक की नज़र से”

  1. nihshabdblog Avatar

    बहुत सुंदर लिखा है… 🙏💛 आपने जिस तरह साधारण और असाधारण के बीच की उस पतली रेखा को महसूस किया है, वही इस उपन्यास की असली खूबसूरती है।
    वो खिड़की सच में सिर्फ दीवार में नहीं, मन में खुलती है और शायद हर किसी को अपने समय पर दिखती है। ऐसे लेख पढ़कर लगता है किताब सिर्फ पढ़ी नहीं गई… जी भी ली गई है। ✨

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    1. R!P Avatar

      बहुत शुक्रिया। आपने जो लिखा — “मन में खुलती है” — यह पढ़कर लगा कि शायद यही इस उपन्यास की सबसे बड़ी सच्चाई है जो मैं शब्दों में नहीं पकड़ पाया था। आपने पकड़ ली।

      लिखना सार्थक हुआ। 🙏

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